सागर – मेरा प्रतिबिम्ब

अथाह सागर का मौन
मुझे मेरे और करीब ले आता है
अपनी लहरों को बिखेरता
यह अहसास कराता है
कि वो भी कुछ मेरे जैसा ही है
अनंत मगर कुछ सहमा सा
और मैं भी उसके जैसी ही हूँ
अपने अंतर्मन में
खुद को टटोलती हुयी
अक्सर निःशब्द और निश्छल
देखा है न उसकी लहरों का अल्हड़पन?
जो नहीं करती किसी की परवाह
और भिगो देती हैं हर किसी को
जिसको वो अपने करीब पाती हैं
वो लहरें रूकती नहीं हैं
वापस आती रहती हैं
लौट कर वापस आती रहती हैं
ज़िन्दगी की तलाश में
खुद को भी खोजती हुयी
और अक्सर खुद को बिखेरती हुयी
ठीक वैसी ही तो हूँ मैं
उन लहरों जैसी
अगाध प्रेम में लिपटी
और जैसे सागर अडिग है न!
बस वैसी ही हूँ
प्रेम करने वाली…
कभी हार न मानने वाली…

अपराजिता!Appy

ज़िन्दगी की मुस्कान

सर्दियों में गुनगुनी धूप सी
कभी छत की मुंडेर पर ढलती रूमानी शाम सी
ज़िन्दगी हमदर्द सी लगने लगती है
बस तेरी एक जादुई मुस्कराहट से…